गणेश चतुर्थी पर विशेष

भारत के धार्मिक theology की जो सबसे distinguished विशेषता है वो ये है कि यहाँ धर्म ‘शास्त्र’ से ज्यादा ‘लोक’ का विषय है। West के अब्राहमिक धर्मों के विपरीत ये ‘विधान’ से ज्यादा ‘लोकाचार’ से परिचालित होता है।

भारत एक _______-प्रधान देश है। इस वाक्य में आप क्या क्या नही भर सकते हैं !!! भारत एक कृषि-प्रधान देश है के जुमले से आगे बढ़ कर ??? मसलन ये एक भाव-प्रधान देश है, ये एक त्यौहार-प्रधान देश है। और भारत एक देव-प्रधान देश भी तो है !!

मुझ जैसे व्यक्ति के लिए जो मूलतः Agonist है उसे भारत-भूमि के लोक-मानस में गहरे बैठा ये देवताओं का बैकुंठ हद से ज्यादा रोमांचित करता है। मेरे लिए देवता ‘इष्ट’ से ज्यादा एक ‘रूपक’, एक ‘व्यंजना’ और अमूर्त भावनाओं की एक मूर्त ‘सर्जना’ है। और तो और भारत के लोक-मानस में गहरे पैठा ये देवलोक उसके अंतर्मन को समझने का सबसे निरापद साधन भी है। इसलिए जिसे भारत को समझना हो वो यहां के देव-लोक को समझ ले। यहां उसे Idea of India का प्रगाढ़ सार मिल जाएगा।

भारत के धार्मिक theology की जो सबसे distinguished विशेषता है वो ये है कि यहाँ धर्म ‘शास्त्र’ से ज्यादा ‘लोक’ का विषय है। West के अब्राहमिक धर्मों के विपरीत ये ‘विधान’ से ज्यादा ‘लोकाचार’ से परिचालित होता है। एक धर्म के तौर पर हिन्दू धर्म के असाधारण और अन्यथा दुर्लभ लोकतांत्रिक चरित्र का ये मूल कारक है। राजनीति-विज्ञान का कोई विद्यार्थी इसकी तुलना किंचित ही अ-लिखित संविधान वाले गणतंत्र से करता।

और धर्म ‘शास्त्र’ से ज्यादा ‘लोक’ का विषय है – गणपति से अधिक इस बात के प्रतीक और कौन हो सकते हैं ??!! शिव के लिए आपको पूरा शिव-पुराण मिलेगा, कार्तिकेय (गणेश के सहोदर) का भी आधोपान्त विवरण आपको स्कंद-पुराण में मिल जाएगा। पर गणेश ?? उनके लिए कोई पृथक पुराण नही। कुल मिला कर ऋग्वेद में एक-दो जगह नामोल्लेख और “ब्रह्मवैवर्त” के गणपति खंड में 46 अध्याय जो मूलतः वैष्णव पुराण है, और पुराणों में सबसे ज्यादा समय समय पर संसोधित बताया जाता है। और इसलिए तो मंगलमूर्ति- गणपति हैं, गणेश हैं। क्योंकि वो तंत्र (शास्त्र) से ज्यादा गण (लोक) से संपूरित हैं। और इसलिए सर्वप्रथम पूजनीय हैं, स्मरणीय हैं और निमंत्रणीय हैं !! और इसलिए देवताओं के protocol में सबसे पहले प्रतिष्ठित भी, सबसे पहले आह्वाहित भी। तंत्र पर लोक की ये प्राथमिकता, प्रधानता और प्राबल्यता भारत के लोकमानस के लोकतांत्रिक चरित्र की सबसे वैध पुष्टि भी है।

भारत के लोगो का अपने देवताओं से ‘विग्रह’ इसके मानस के मनोस्थिति और मनोविज्ञान की और भी दुर्लभ अन्तर्दृष्टियाँ प्रदान करता है। जैसे स्त्री-मनोविज्ञान ही ले लें। हिन्दू स्त्रियों के सबसे अभीष्ट देवों को देखिए। आपको स्त्री-मनोविज्ञान के अहर्निश रहस्य उद्घाटित मिलेंगे। जैसे अगर सामान्यीकरण का जोखिम मोल लिया जाए तो हर हिन्दू स्त्री मन ही मन गणेश सा सखा, कृष्ण सा प्रेमी और शिव सा पति चाहती है।

गणेश मंगलकर्ता है, विघ्नहर्ता हैं। और इसलिए सखा के तौर पर सर्वथा उपयुक्त हैं। कृष्ण तो निर्विवाद रूप से प्रेम के साक्षात विग्रह हैं। उनका युद्ध भी प्रीतिकर है, फटकार भी ‘गीता’ है, शरारतें तो ‘लीला’ हैं ही। क्या ही कौतुक की स्त्री विधाता से कृष्ण सा प्रेमी और पुत्र मांगे !! किंतु स्त्री-मनिविज्ञान का सबसे वलित पक्ष तब सामने आता है जब स्त्री पति की कामना करती है। ये अन्यथा नही है कि लड़कियां मनचाहे वर की चाह करते हुए श्रावण सोमवार का व्रत करती हैं। पौरुष से भरे शिव जो सर्वनाश का सौंदर्यशास्त्र रचते हों, जिनके प्रेम में भी एक ‘हिंसा’ हो, जो विपन्न होने के बाद भी अपने सामर्थ्य के बल पर ‘महादेव’ हों और जिसकी अर्धांगिनी बनने से स्त्री स्वतः शक्तिरूपेण हो उठती हो- स्त्री मन ही मन ऐसे ही वर की तलाश करती है। Chocolaty boys are fit for being lovers and sturdy men are fit for being life-partners- पश्चिम की ये नवीन प्रतिपादित कामशास्त्रीय अभिव्यंजना भारत ने बहुत पहले से आत्मसात कर रखी है। वहीं ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ राम का स्त्रियों में ‘अभीष्ट’ के रूप में लोकप्रिय न रहना भी स्त्री-मनोविज्ञान के गहरे अर्थ और संकेत बताता है| So Boys don’t sulk to the fact that ‘good’ boys are often sidelined by girls. They treat even gods same way.

– अनिकुल के कलम से

नोट: ये टिप्पणी मित्र सुशोभित के गणपति पर फेसबुक पर पोस्ट किए गए आलेख से प्रेरित है। ये टिप्पणी उस पोस्ट पर एक टीका-मात्र है, एक उप-संहार है। अन्यान्य विचार उस पोस्ट से लिये गए हैं जिसमे मेरे विचार भी सम्मिलित हुए।

(ये पोस्ट मूल रूप से लेखक के पिछले ब्लॉग पर २९/०८/२०१७ को प्रकाशित हुई थी )

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