पत्रकारिता की राजनीति

दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के प्रधान संपादक शशिशेखर के हिंदी ब्लॉग्स मैं अक्सर पढता हूँ। हिंदी celebrity पत्रकारिता जगत के कुछ विचारशील ब्लॉग्स में उनका ब्लॉग अवश्य आएगा, ndtv वाले रविश कुमार के बाद। अगर बाकी बहुत सारे ‘celeberities’ की तरह न होकर वो अपना ब्लॉग खुद लिखते हैं तो वो जरूर बधाई के पात्र हैं।

इस बार वो उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव के बारे में बोल रहे थे। उससे ज्यादा सपा में फैले पारिवारिक कलह पर। इस ब्लॉग में उनका एक विशेष आग्रह इस बात को स्थापित करने में रहा की उत्तर प्रदेश की राजनीति की सफलता ही देश की राजनीति में सफलता होने का पर्याय है। देश की राजनीति, उत्तर प्रदेश की राजनीति की अनुगामी है। इस कथ्य में, इस तथ्य में सामान्यतः तो अनुचित कुछ भी नही है। राजनीति के सन्दर्भ में तो बिलकुल भी नहीं। लेकिन इस तथ्य को लिखते समय शशि शेखर जी का ध्यान इस बात पर पता नही गया होगा या नही की देश के सबसे बड़े हिंदी अख़बार के प्रधान संपादक के पद पर उनका सुशोभित होना भी क्या राजनीति के एक चलन की पत्रकारिता के द्वारा अंधी अनुगामिता ही थी ?

एक लोकतांत्रिक देश में राजनीति लोकतंत्र का एक फलन होती है। ये उसकी स्वाभाविक गति है। इसलिए राजनीति में देश की सबसे बड़ी आबादी को अपने कोख में रखने वाला प्रदेश अपने मूड के हिसाब से देश भर कीे राजनीति की दिशा और दशा निर्धारित करे तो वहाँ तो ये स्वाभाविक लगता है और सुखद भी। किंतु पत्रकारिता भी इसी चलन का शिकार हो जाए तो वो दुखद है। बल्कि त्रासद। हालांकि राजनीति में भी democracy और meritocracy का एक द्वन्द रहता ही है। पर लोकतंत्र का ये श्याम पक्ष राजनीति के सन्दर्भ में इसके बाकी उज्जवल पक्षों से छुप जाता है। और कई बार नही भी। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की बदहाली के मूल में भी वस्तुतः यही द्वन्द है। राहुल गाँधी कांग्रेस के अंदर सबसे ज्यादा स्वीकार्य तो हैं पर योग्य नही। लोकतंत्र का ये श्याम पक्ष उसके बाकी उज्जवल पक्षों पर भारी न पड़ जाये इसलिए दुनिया भर के polity thoughts में लोकतंत्र को अपनाते समय कुछ safeguards रखे गयें। bicamerialism और special minority rights जैसी व्यवस्थाएं दरअसल यहीं तो हैं।

और इसलिए प्रमोद जोशी जैसे लोगो के रहते अगर शशि शेखर पत्रकारिता में आगे बढ़ते हैं तो ये समझ आ जाता है कि पत्रकारिता जब राजनीति की अनुगामी बनती है तो वो राजनीति से ज्यादा भ्रष्ट होती है क्योंकि राजनीति में तो कुछ safeguards भी नैसर्गिक रूप से विद्यमान रहते हैं पर पत्रकारिता वहां पर भी मात खा जाती है । बहुमत की प्रधानता राजनीति के लिए तो वरदान है पर पत्रकारिता के लिए अभिशाप। और फिलहाल देश की पत्रकारिता इस दृष्टि से अभिशप्त है। शायद ये हमारे देश के पत्रकारों का राजनेताओं केे साथ अनावश्यक और अधिक्यपूर्ण संगत का नतीजा हो।

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