प्रेम का प्रेत

हम कितने ही विरोधाभासों को जीते हैं !! अब ये ही कैसा विरोधाभास है की हम अपने प्रेम को पाना चाहते हैं ?? कितने आतुर होते हैं उसे पाने के लिए?? कितने अधीर होते हैं ? ये जानते हुए भी ‘पाना’ प्रेम का ‘उत्सर्ग’ है। Climax !! उसी तरह जैसे मृत्यु जीवन का है। पर हम मरने को तो वैसी आतुरता नही दिखाते ?? उलट हम जितना हो सके उतना लंबा जीना चाहते हैं। जीने की इच्छा और प्रेम करने की इच्छा मनुज के ‘basic instinct’ के दो बड़े घटक हैं। लेकिन ‘psychological functionalism’ के नज़रिए से इन दोनों भावों के ‘behavioural execution’ में इतना अंतर कैसे आता है की एक में हम क्लाइमेक्स को जितना दूर रख सके उतना दूर रखना चाहते हैं वहीँ दूसरे में climax को हम जितना जल्द पा सके पाना चाहते हैं ??!! मुझे नही पता की किसी biopsychologist ने इस विरोधाभास पर काम किया है या नहीं। पर ठीक से देखने पर ये विरोधाभास sciences of human behaviour के सबसे रोचक पक्षो में से निश्चित ही एक होगा। मेरी दृष्टि जहाँ तक जाती है इसके पीछे का कारण शायद argue for life और argue for love के पीछे के ’emotive factor’ का अलग होना हो। ‘argue for love’ में जहाँ ये emotive factor ‘surrender’ है वहीं ‘argue for life’ में ‘fight’ । और शायद इसी कारण प्रेम में हम इतने  climax-seeking होते हैं और जीवन में उतने ही climax-phobic !! पर क्या हमें प्रेम में भी climax-phobic नही होना चाहिए ?? क्योंकि climax अंत ही तो है। चरम पर अंत !! और इसलिए एक ‘शाश्वत प्रेमी’ के लिए सबसे दुखद अपने प्रेम को पाना होता है।

 

विलक्षण ही कोई प्रेमी होता है जो ये समझ पाता है कि प्रेम को ‘पाना’ दरअसल अपने साथ एक ‘विजेता’ की ग्रंथि को लेकर आता है जो प्रेम के मूल भाव ‘समर्पण’ के विपरीत होता है। और ये विपरीत मेल अंततः प्रेम को खुरच डालता है, उसका अंत कर देता है, क्लाइमेक्स की तरफ ले जाता है। एक सच्चा प्रेमी वही होता है जो प्रेम में भी climax की चाहत न करे। क्योंकि climax के बाद जो रह जाता है वो प्रेम का प्रेत होता है। अतृप्त !! और इसलिए ये अकारण नही हैं कि साहित्य और इतिहास दोनों में प्रेम की सबसे महान कहानियाँ वो हुईं जहाँ नायक-नायिका का मिलन संभव नही हो पाया, उनका एक दूसरे को पाना संभव नही हो पाया। प्रेम की सार्थकता ‘मिलन’ में नही बल्कि ‘प्रतीक्षा’ में ही है। लेकिन हम अपने ‘natural tendency’ के मारे हैं। ‘जीवित’ प्रेम को जल्द ही climax तक पहुँचा देते हैं और फिर उम्र भर उस प्रेम के ‘प्रेत’ को ढोते रहते हैं।

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