‘मनुष्य की इच्छाएं’ या ‘इच्छाओं का मनुष्य’

इच्छाओं का ‘क्यों’ नही होता। उनका ‘कब’ होता है, ‘कहाँ’ होता है, यहां तक कि ‘कैसे’ भी होता है। पर नही होता है तो ‘क्यों’। इच्छाएं होती है ‘आदम’ सी। उनका ‘पता’ तो पता होता है, पर नही पता होता है तो उनका ‘कारक’। वो क्यों जन्म लेती है- ये अज्ञात ही है; जैसे मनुष्य क्यों जन्म लेता है, ये है अब तक अबोध !!

हज़ारों , लाखो इच्छाएं, जैसे हज़ारो, लाखो मनुष्य !! पता नही इस पृथ्वी पर मनुष्य ज्यादा हैं या इच्छाएं !! और क्या पता हम मनुष्य भी इच्छाएं ही हो किसी की !! किसी विराट की !! हम लाखों- करोड़ों मनुष्य, किसी विराट की लाखों-करोड़ो इच्छाएं !! और फिर इन लाखों मनुष्य की लाखों इच्छाएं !! लाखों के ‘आधार’ (base) पर लाखों का ये ‘घातांक’ (exponent), गणित का अंकीय ‘विराट’ है या उस ‘विराट’ का गणितीय ‘अंकन’- पता नही।

इच्छाएं जूझती है सिर्फ अपने ‘क्यों’ से। पर मनुष्य वो ‘इच्छा’ है जो न केवल अपने ‘क्यों’ से जूझता है बल्कि जूझता है अपने ‘कौन’ से भी ?? ‘मैं क्यों हूँ और मैं कौन हूँ ???’- ये वो दो सवाल हैं जिसने अध्यात्म की आधारशिला रखी और इन दोनो सवालों से जूझते हुए मनुष्य ने देवता से लेकर ईश्वर तक का अविष्कार कर डाला !! पर फिर भी वो कोई पुख्ता जवाब न पा सका।

मनुष्य कौन है ?? क्या किसी की इच्छा और फिर उस इच्छा की इच्छा का ‘समुच्चय’ ही मनुष्य है ?? संभवत: !! मनुष्य इच्छाओं का ‘फलन’ (function) ही तो है। इच्छाओं का ‘पिता’, इच्छाओं का ‘पुत्र’, इच्छाओं का ‘स्वामी’ और इच्छाओं का ‘दास’ !! या इनमे से कुछ न होकर, इच्छाओं के ‘multiplexing’ का माध्यम ( electronic और logic circuit के भाषा मे MUX) मात्र है ??!! शायद हाँ !! और इसलिए ‘मनुष्य की इच्छाएं’ जैसी कोई चीज़ नही होती, होता है तो होता है ‘इच्छाओं का मनुष्य’ !!

अनिकुल के कलम से

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *