‘मनुष्य की इच्छाएं’ या ‘इच्छाओं का मनुष्य’

इच्छाओं का ‘क्यों’ नही होता। उनका ‘कब’ होता है, ‘कहाँ’ होता है, यहां तक कि ‘कैसे’ भी होता है। पर नही होता है तो ‘क्यों’। इच्छाएं होती है ‘आदम’ सी। उनका ‘पता’ तो पता होता है, पर नही पता होता है तो उनका ‘कारक’। वो क्यों जन्म लेती है- ये अज्ञात ही है; जैसे मनुष्य क्यों जन्म लेता है, ये है अब तक अबोध !!

हज़ारों , लाखो इच्छाएं, जैसे हज़ारो, लाखो मनुष्य !! पता नही इस पृथ्वी पर मनुष्य ज्यादा हैं या इच्छाएं !! और क्या पता हम मनुष्य भी इच्छाएं ही हो किसी की !! किसी विराट की !! हम लाखों- करोड़ों मनुष्य, किसी विराट की लाखों-करोड़ो इच्छाएं !! और फिर इन लाखों मनुष्य की लाखों इच्छाएं !! लाखों के ‘आधार’ (base) पर लाखों का ये ‘घातांक’ (exponent), गणित का अंकीय ‘विराट’ है या उस ‘विराट’ का गणितीय ‘अंकन’- पता नही।

इच्छाएं जूझती है सिर्फ अपने ‘क्यों’ से। पर मनुष्य वो ‘इच्छा’ है जो न केवल अपने ‘क्यों’ से जूझता है बल्कि जूझता है अपने ‘कौन’ से भी ?? ‘मैं क्यों हूँ और मैं कौन हूँ ???’- ये वो दो सवाल हैं जिसने अध्यात्म की आधारशिला रखी और इन दोनो सवालों से जूझते हुए मनुष्य ने देवता से लेकर ईश्वर तक का अविष्कार कर डाला !! पर फिर भी वो कोई पुख्ता जवाब न पा सका।

मनुष्य कौन है ?? क्या किसी की इच्छा और फिर उस इच्छा की इच्छा का ‘समुच्चय’ ही मनुष्य है ?? संभवत: !! मनुष्य इच्छाओं का ‘फलन’ (function) ही तो है। इच्छाओं का ‘पिता’, इच्छाओं का ‘पुत्र’, इच्छाओं का ‘स्वामी’ और इच्छाओं का ‘दास’ !! या इनमे से कुछ न होकर, इच्छाओं के ‘multiplexing’ का माध्यम ( electronic और logic circuit के भाषा मे MUX) मात्र है ??!! शायद हाँ !! और इसलिए ‘मनुष्य की इच्छाएं’ जैसी कोई चीज़ नही होती, होता है तो होता है ‘इच्छाओं का मनुष्य’ !!

अनिकुल के कलम से

The evolution of Polity

तमाम बदनामियों के बावजूद राजनीति (अर्थशास्त्र के बाद) मानव समाज का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावकारी विषय है, लगातार बना हुआ है। ब्रिटानिया के brexit और अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प के विजय से लेकर इजराइल में नेतन्याहू का लगातार मजबूत होते जाना- इन घटनाओं ने विश्व को जितना प्रभावित किया है शायद ही किन्ही और घटनाओं ने किया हो। राजनीति आज भी समाज को सबसे ज्यादा करीब से प्रभावित करती है। राजनीति को अगर सबसे कम शब्दों में बताया जाये तो ये समाज के अन्यथा बेतरीब क्रियाकलापों को एक सार्थक और स्पष्ट दिशा देने की जुगत है। और राजनीति के सबसे समाचीन और शायद सबसे उन्नत उपकरण के रूप में लोकतंत्र मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। एक fan के तौर पर नही। बल्कि एक case study के तौर पर। लोकतंत्र अपने आप में एक रोचक चीज़ है। इसका इतिहास भी, और इसका क्रमतर विकास भी।

शायद ही इसमें कोई दोमत होगा की फिलहाल लोकतंत्र राजनीति का सबसे उन्नत और परिपक्व उपकरण है। और सबसे delicate भी। लोकतंत्र एक बृहद मनुष्य समाज के तौर पर हमारे collective conscious के क्रमतः परिपक्व होने की कहानी है। जैसा की राजनीति चूँकि वस्तुतः समाज के बेतरीब क्रियाकलापों को एक दिशा देने की क्रिया थी हमने एक समाज के तौर पर अपने सामूहिक विवेक के विकास के शैशव काल में एक व्यक्ति के हाथ में इस दिशा को निर्धारित करने का काम delegate कर दिया। कालान्तर में ये monarchy जैसी संस्था में तब्दील हो गयी। जो अपने साथ ‘सत्ता’ का जबरदस्त केंद्रीकरण लेकर आई। “सत्ता”- यानि राजनीति का एक organic विस्तार। राजनीति जब फलीभूत होती है तो सत्ता के तौर पर सामने आती है।

अब जैसे जैसे हमारी कलेक्टिव कॉन्शियस का विकास हुआ हमने महसूस किया कि सत्ता का ये केंद्रीकरण समाज के स्वस्थ growth को एक तरह से रोक रहा है। तब राजा का साथ देने वाले मात्यों के सलाह को राजा के लिए बाध्यकारी कर दिया गया। फिर मात्यों को जनप्रतिनिधियों से replace कर दिया गया। फिर एग्जीक्यूटिव हेड और नॉमिनल हेड ऑफ़ गवर्नमेंट की अवधारणाएं आयी और हम नॉन-रिपब्लिकन डेमोक्रेसी की तरफ बढ़ें। फिर नॉमिनल हेड को भी जनता से चुना हुआ बनाया गया और हम रिपब्लिकन डेमोक्रेसी की तरफ फाइनली बढे। हमने महसूस किया कि सत्ता का जितना विकेंद्रीकरण किया जा सकें उतना अच्छा है। और हम क्रमशः उस दिशा में बढ़ते चले गए। अब तो referendum democracies की बात की जा रही है जहाँ हर छोटे बड़े इश्यूज पर लोगो की वोटिंग से ही फैसला किया जाये। यानी की सत्ता का पूर्ण विकेंद्रीकरण।
पहली नज़र में बड़ी अच्छी लगने वाली ये बात अपने साथ एक बारीक पेंच लेकर आती है। सोचिये की आखिर सत्ता ने समाज में अपनी जरुरत ही कैसे बनायी होगी ? जाहिर तौर पर राजनीति के जरुरत के तौर पर क्योंकि आखिर ये राजनीति का ही ‘आर्गेनिक’ विस्तार है। और राजनीति की जरुरत क्यों महसूस की गयी होगी ? क्योंकि अन्यथा समाज के असंगठित क्रियाकलापों को एक दिशा की जरुरत थी जो समाज के विकास के लिए जरुरी थी। सत्ता का पूर्णतः विकेंद्रीकरण हमें वापस उसी दशा में ले जाता है जहाँ ‘दिशा’ के लोपन का खतरा होता है। इसलिए सत्ता का एक निश्चित केंद्रीकरण भी समाज के सुचारू चलन और विकास के लिए उतना ही जरुरी है।

अनिकुल के कलम से

पत्रकारिता की राजनीति

दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के प्रधान संपादक शशिशेखर के हिंदी ब्लॉग्स मैं अक्सर पढता हूँ। हिंदी celebrity पत्रकारिता जगत के कुछ विचारशील ब्लॉग्स में उनका ब्लॉग अवश्य आएगा, ndtv वाले रविश कुमार के बाद। अगर बाकी बहुत सारे ‘celeberities’ की तरह न होकर वो अपना ब्लॉग खुद लिखते हैं तो वो जरूर बधाई के पात्र हैं।

इस बार वो उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव के बारे में बोल रहे थे। उससे ज्यादा सपा में फैले पारिवारिक कलह पर। इस ब्लॉग में उनका एक विशेष आग्रह इस बात को स्थापित करने में रहा की उत्तर प्रदेश की राजनीति की सफलता ही देश की राजनीति में सफलता होने का पर्याय है। देश की राजनीति, उत्तर प्रदेश की राजनीति की अनुगामी है। इस कथ्य में, इस तथ्य में सामान्यतः तो अनुचित कुछ भी नही है। राजनीति के सन्दर्भ में तो बिलकुल भी नहीं। लेकिन इस तथ्य को लिखते समय शशि शेखर जी का ध्यान इस बात पर पता नही गया होगा या नही की देश के सबसे बड़े हिंदी अख़बार के प्रधान संपादक के पद पर उनका सुशोभित होना भी क्या राजनीति के एक चलन की पत्रकारिता के द्वारा अंधी अनुगामिता ही थी ?

एक लोकतांत्रिक देश में राजनीति लोकतंत्र का एक फलन होती है। ये उसकी स्वाभाविक गति है। इसलिए राजनीति में देश की सबसे बड़ी आबादी को अपने कोख में रखने वाला प्रदेश अपने मूड के हिसाब से देश भर कीे राजनीति की दिशा और दशा निर्धारित करे तो वहाँ तो ये स्वाभाविक लगता है और सुखद भी। किंतु पत्रकारिता भी इसी चलन का शिकार हो जाए तो वो दुखद है। बल्कि त्रासद। हालांकि राजनीति में भी democracy और meritocracy का एक द्वन्द रहता ही है। पर लोकतंत्र का ये श्याम पक्ष राजनीति के सन्दर्भ में इसके बाकी उज्जवल पक्षों से छुप जाता है। और कई बार नही भी। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की बदहाली के मूल में भी वस्तुतः यही द्वन्द है। राहुल गाँधी कांग्रेस के अंदर सबसे ज्यादा स्वीकार्य तो हैं पर योग्य नही। लोकतंत्र का ये श्याम पक्ष उसके बाकी उज्जवल पक्षों पर भारी न पड़ जाये इसलिए दुनिया भर के polity thoughts में लोकतंत्र को अपनाते समय कुछ safeguards रखे गयें। bicamerialism और special minority rights जैसी व्यवस्थाएं दरअसल यहीं तो हैं।

और इसलिए प्रमोद जोशी जैसे लोगो के रहते अगर शशि शेखर पत्रकारिता में आगे बढ़ते हैं तो ये समझ आ जाता है कि पत्रकारिता जब राजनीति की अनुगामी बनती है तो वो राजनीति से ज्यादा भ्रष्ट होती है क्योंकि राजनीति में तो कुछ safeguards भी नैसर्गिक रूप से विद्यमान रहते हैं पर पत्रकारिता वहां पर भी मात खा जाती है । बहुमत की प्रधानता राजनीति के लिए तो वरदान है पर पत्रकारिता के लिए अभिशाप। और फिलहाल देश की पत्रकारिता इस दृष्टि से अभिशप्त है। शायद ये हमारे देश के पत्रकारों का राजनेताओं केे साथ अनावश्यक और अधिक्यपूर्ण संगत का नतीजा हो।

zender विमर्श और सेक्स

“सेक्स के doctrine पर अपनी मानसिकता को हावी रखने की चेष्टा पुरुष के लिए बड़ा आत्मघाती कदम था। आज पुरुष अपनी कामुकता के लिए दुनिया भर की अदालतों के कठघरे में अपराधी के रूप में खड़ा होकर इस धृष्टता की कीमत भी अदा कर रहा है”

स्त्री-पुरुष संबंधों पर कोई भी बात सेक्स के विमर्श के बिना नही की जा सकती| क्योंकि सेक्स ही इन दोनों के बीच का अनन्यतम संबंध है। बाकी सभी संबंध इस संबंध के फलन मात्र हैं। विडंबना ये है कि अधिकतर जेंडर संबंधी विमर्श या तो सेक्स को अपने विमर्श में शामिल नही करती या शामिल करती भी है तो सेक्स को लेकर एक balanced या natural stance इस परिपेक्ष्य में सामने नही रख पाती। ज्यादातर प्रबुद्ध विचारको ने भी इस विषय पर एक रहस्यमयी चुप्पी ओढ़े रखी है। एकमात्र ओशो ही हैं जिन्होंने इस बारे में थोड़ा-बहुत बोला। उन्होंने कहा कि सेक्स से बड़ी फ़ोर्स नही है, दुनिया मे जो भी creativity है उसके मूल में सेक्स ही है। वो जीवन की अनिवार्यता है। सारी प्रकृति उस पर खड़ी है, सारा विराट सृजन उस पर खड़ा है। अगर हम इसे निंदित बना देंगे तो सारा मामला ही गड़बड़ा जाएगा। और गड़बड़ा गया है। इसलिए मनुष्य का चित्त रुग्ण से रुग्ण होता जा रहा है। ओशो सही थें कि सेक्स के प्रति निंदात्मक रवैये ने मनुष्य के चित्त को रुग्ण से रुग्णतर कर दिया। लेकिन ओशो भी इतना ही कह कर रुक गए। इससे आगे नही गए। ओशो को इससे आगे जाना चाहिए था। उन्हें बताना चाहिए था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ कि निर्माण की एक क्रिया निषेध की अधिकारी करार दे दी गयी ?? ऐसा कैसे हुआ कि सृजन का एक यज्ञ मनुज मानस में क्रमशः धिक्कार के वेदी पर बलि चढ़ता गया ?? क्या त्रासदी हुई कि वो मनुष्य जो येन-केन प्रकारेण खुद को रचयिता कहलवा सकने को इतना लालायित रहता है उसने रचना की सबसे मौलिक क्रिया को वर्जना की हद तक छिपाने की कोशिश की ???

संभवत: ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बाकी विषयों की तरह सेक्स के doctrine पर भी शुरुवात से patriarchal सोच ने अपना कब्जा जमा लिया। जबकि सेक्स अनिवार्य रूप से एक ‘स्त्री-विषय’ है। हम माने या न माने पुरुष की भूमिका सेक्स में वस्तुतः एक ‘सेवक’ के सदृश है, जहाँ वास्तविक आनंद स्त्री के हिस्से होता है। ये अलग बात है कि पुरुष अहंकार कभी ये बात मानना नही चाहता।

देखे तो सेक्स मूलतः प्रेम का एक ‘उपकरण’ है। एक साधन। पर इसे लेकर स्त्री और पुरुष के नज़रिए में एक fundamental अंतर है। स्त्री के लिए प्रेम सेक्स का एक inseperable अंग है। वो यहाँ उद्देश्य (प्रेम) और उपकरण(सेक्स) में भेद नही करती। वो सेक्स उसी से कर सकती है जिससे प्रेम करती है। जबकि पुरुष के लिए प्रेम और सेक्स दो अलग अलग चीजें हैं। उसके लिए प्रेम का होना सेक्स की अनिवार्य शर्त नही है। यहाँ वो उपकरण और उद्देश्य में फर्क करता है। वो उससे भी सहज ही सेक्स कर सकता है जिससे प्रेम नही करता। उपकरण को उद्देश्य से अलग कर देख सकने की ये पुरुष-प्रवृति उसे यौनिक रूप से उच्छशृंखल तो बनाती है लेकिन इस ‘उद्देश्यरहित-उपकरण’ की अपूर्णता और उसमें छिपी कपटता का भी उसे कहीं न कहीं बखूबी भान होता है। शायद यहीं से सेक्स के साथ एक किस्म के ‘अपराधबोध’ के भाव के जुड़ने की शुरुवात होती है। चूंकि सेक्स के पूरे doctrine का संचालन पुरुष वर्चस्व वाले समाज के पुरुष-सोच से हुआ, ग्लानि से भरे पुरुष के ‘alter-ego’ ने इस पूरी क्रिया को ही अनैतिक करार दे दिया, एक taboo बना दिया। शनै-शनै सेक्स के प्रति निंदात्मक भाव ने स्त्री और पुरुष दोनों के मानस में समान रूप से अपने को स्थापित कर लिया। जबकि सेक्स मूल रूप से इस दुनिया की सबसे सहज और सबसे मासूम क्रिया है। आज भी मातृसत्तात्मक समाजों में सेक्स उस किस्म का taboo नही है, बल्कि कोई टैबू ही नही है। यही कारण है कि वहाँ यौन अपराध भी न के बराबर हैं। क्योंकि स्त्री-मानसिकता से संचालित हुए सेक्स के doctrine में किसी प्रकार के अपराधबोध का भाव सम्मिलित नही था। और इसी कारण वहाँ वो अपनी स्वाभाविक गति से सहजता और परिपक्वता के साथ evolve हुआ।

सेक्स के doctrine पर अपनी मानसिकता को हावी रखने की चेष्टा पुरुष के लिए बड़ा आत्मघाती कदम था। आज पुरुष अपनी कामुकता के लिए दुनिया भर की अदालतों के कठघरे में अपराधी के रूप में खड़ा होकर इस धृष्टता की कीमत भी अदा कर रहा है। सेक्स का taboo बन जाना स्त्री-पुरुष संबंधों के evolution की सबसे बड़ी त्रासदी है और patriarchal mentality का सबसे बड़ा दोष !!! इस त्रासदी का सबसे बड़ा दुष्परिणाम ये सामने आया कि इसने स्त्री-पुरुष संबंधों को हद से अधिक जटिल कर दिया। बल्कि messy !! इस हद तक कि एक दूसरे को complement करने के लिए बनी दो identities, एक दूसरे को क्रूरता की हद तक compete कर रही हैं। आज feminism के हाहाकारी शोर और पुरुष-वर्चस्व के पाश्विक अट्टहास के बीच पड़ी ये दुनिया इस ऐतिहासिक दुर्घटना की अंतहीन शिकार है।

– अनिकुल के कलम से

भारतीय मीडिया: निष्पक्षीय, एकपक्षीय या बहुपक्षीय ??

निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया के संकल्पना का व्यवाहारिक रास्ता है

आज जब मोदी सरकार के तीन साल पूरे हुए हैं तो इन तीन सालों में हुए बदलावों पर स्वाभाविक रूप से पूरे देश मे चर्चाओं का एक दौर चला है। कुछ मोदी सरकार खुद भी इन चर्चाओं को कराने को उत्सुक दिखती है। विपक्ष तो इच्छुक है ही। जाहिर है कई विषयों पर चर्चा होगी। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक, रणनीतिक। मैं आज इन विषयों पर बात नही करना चाहता। नही करना चाहता इसके कई कारण है। पहला तो ये की मैं अक्सर इन क्षेत्रों में हो रहे बदलावों पर ब्लॉग वगैरह पर लिखता रहा हूँ। दूसरा, आज इन चीजों पर पहले ही टनों स्याही बहाई जा चुकी होगी और तीसरा की आज जिस विषय पर में बात करना चाहता हूं वो आज शर्तिया नही हुई होंगी या हुई भी होंगी तो उस परिपेक्ष्य में नही हुई होंगी जिस परिपेक्ष्य में होनी चाहिए।

मोदी सरकार में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वो मीडिया में आया हैं। रजत शर्माओं, अरनबों, सरदनाओं, सुधीर चौधरियों, गौरव सावन्तो और मारूफ रजाओं का आदुर्भाव भारतीय मीडिया के course of evolution का एक महत्वपूर्ण devlopmemt है। लोकतंत्र में आदर्श स्थिति ये होती है कि मीडिया निष्पक्ष रहता। भारत मे पत्रकारिता लगभग शुरू से वैचारिक स्तर पर एक खास ओर झुकी रही पर पिछले लगभग 12 सालों से जबसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया ये ‘वैचारिक झुकाव’ शनै शनै ‘दलीय पक्षधरता’ में बदलता चला गया। और जब संघवीयों, बरखाओं, सरदेसाईओं और रविशों जैसे पत्रकारिता के सबसे बड़े नाम एक साथ एक समूह के तौर पर एक पक्ष में जा मिले तो ये स्वाभाविक हो गया था कि एक institution के तौर पर पत्रकारिता में इस ‘पक्ष’-धरता के मुकाबिल एक ‘विपक्ष’ भी उभरे।

लोकतंत्र की बेहतरी के लिए ये जरूरी है कि लोकतंत्र में संस्थाएं (जिसमे press भी आता है-लोकतंत्र का चौथा स्तंभ) या तो निष्पक्ष हों या बहुपक्षीय। लोकतंत्र में एकपक्षीय संस्था से घातक कुछ नही होता। प्रेस कुछ दिनों से पूरी तरह से एकपक्षीय हो गया था। रजत शर्मा, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, गौरव सावंत ने उस ‘एकपक्षीय’ मीडिया को ‘बहु-पक्षीय’ बनाया। मोदी सरकार के इन तीन सालों का ये सबसे बड़ा बदलाव है और एक शुभ बदलाव है। ये स्थिति भले निष्पक्ष मीडिया के utopian अवधारणा जैसी आदर्श नही है पर ‘एकपक्षीय’ मीडिया के त्रासदी से लाखों गुणा बेहतर है।

बल्कि एक दृष्टि से बहुपक्षीय मीडिया ‘निष्पक्ष मीडिया’ के अवधारणा के काफी पास है। मिसाल के तौर पर- जब पाकिस्तान के संदर्भ में अर्णब आक्रामक तौर-तरीको की पैरवी करते हुए उसके लाभों को गिनाते हैं और बरखा pacifist appeal करते हुए युद्ध की कीमत याद दिलाती हैं; तो भले व्येक्तिक-स्तर पर वो दो विरोधी पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों पर मीडिया के ‘collective-conscious’ के व्यापक परिदृश्य पर वो सामूहिक तौर पर एक ‘निष्पक्ष तस्वीर’ ही सामने रखते हैं। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ये उस स्थिति से भी कहीं ज्यादा बेहतर है जब इस मामले में बरखा के अकेले show में वो आदतन pacifist appeal करते हुए देश को युद्ध की कीमत याद दिलाती रहती। और जिसके बरबक्स पाकिस्तान के establishment को ये तर्जुमा रहता कि there is no cost of spreading terrorism in India and India will not retaliate back as they fear for cost of a war with us.

दरअसल निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया के संकल्पना का व्यवाहारिक रास्ता है। हमें रजत शर्माओं, अर्णबों, सरदनाओं और सुधीर चौधरियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने जाने-अनजाने वैचारिक पूर्वाग्रह के बोझ से एकपक्षीय होती देश की मीडिया को बहु-पक्षीय और तदसमात निष्पक्ष बनाया। मोदी सरकार के तीन सालों में आया ये परिवर्तन एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है जो अपने साथ दूरगामी प्रभाव लिए आया है।

– अभिनव शंकर

(ये विचार 28 मई, 21017 को लिखे गए जो इस ब्लॉग पर अब प्रकाशित हो रहे)

प्रेम का प्रेत

हम कितने ही विरोधाभासों को जीते हैं !! अब ये ही कैसा विरोधाभास है की हम अपने प्रेम को पाना चाहते हैं ?? कितने आतुर होते हैं उसे पाने के लिए?? कितने अधीर होते हैं ? ये जानते हुए भी ‘पाना’ प्रेम का ‘उत्सर्ग’ है। Climax !! उसी तरह जैसे मृत्यु जीवन का है। पर हम मरने को तो वैसी आतुरता नही दिखाते ?? उलट हम जितना हो सके उतना लंबा जीना चाहते हैं। जीने की इच्छा और प्रेम करने की इच्छा मनुज के ‘basic instinct’ के दो बड़े घटक हैं। लेकिन ‘psychological functionalism’ के नज़रिए से इन दोनों भावों के ‘behavioural execution’ में इतना अंतर कैसे आता है की एक में हम क्लाइमेक्स को जितना दूर रख सके उतना दूर रखना चाहते हैं वहीँ दूसरे में climax को हम जितना जल्द पा सके पाना चाहते हैं ??!! मुझे नही पता की किसी biopsychologist ने इस विरोधाभास पर काम किया है या नहीं। पर ठीक से देखने पर ये विरोधाभास sciences of human behaviour के सबसे रोचक पक्षो में से निश्चित ही एक होगा। मेरी दृष्टि जहाँ तक जाती है इसके पीछे का कारण शायद argue for life और argue for love के पीछे के ’emotive factor’ का अलग होना हो। ‘argue for love’ में जहाँ ये emotive factor ‘surrender’ है वहीं ‘argue for life’ में ‘fight’ । और शायद इसी कारण प्रेम में हम इतने  climax-seeking होते हैं और जीवन में उतने ही climax-phobic !! पर क्या हमें प्रेम में भी climax-phobic नही होना चाहिए ?? क्योंकि climax अंत ही तो है। चरम पर अंत !! और इसलिए एक ‘शाश्वत प्रेमी’ के लिए सबसे दुखद अपने प्रेम को पाना होता है।

 

विलक्षण ही कोई प्रेमी होता है जो ये समझ पाता है कि प्रेम को ‘पाना’ दरअसल अपने साथ एक ‘विजेता’ की ग्रंथि को लेकर आता है जो प्रेम के मूल भाव ‘समर्पण’ के विपरीत होता है। और ये विपरीत मेल अंततः प्रेम को खुरच डालता है, उसका अंत कर देता है, क्लाइमेक्स की तरफ ले जाता है। एक सच्चा प्रेमी वही होता है जो प्रेम में भी climax की चाहत न करे। क्योंकि climax के बाद जो रह जाता है वो प्रेम का प्रेत होता है। अतृप्त !! और इसलिए ये अकारण नही हैं कि साहित्य और इतिहास दोनों में प्रेम की सबसे महान कहानियाँ वो हुईं जहाँ नायक-नायिका का मिलन संभव नही हो पाया, उनका एक दूसरे को पाना संभव नही हो पाया। प्रेम की सार्थकता ‘मिलन’ में नही बल्कि ‘प्रतीक्षा’ में ही है। लेकिन हम अपने ‘natural tendency’ के मारे हैं। ‘जीवित’ प्रेम को जल्द ही climax तक पहुँचा देते हैं और फिर उम्र भर उस प्रेम के ‘प्रेत’ को ढोते रहते हैं।

गणेश चतुर्थी पर विशेष

भारत के धार्मिक theology की जो सबसे distinguished विशेषता है वो ये है कि यहाँ धर्म ‘शास्त्र’ से ज्यादा ‘लोक’ का विषय है। West के अब्राहमिक धर्मों के विपरीत ये ‘विधान’ से ज्यादा ‘लोकाचार’ से परिचालित होता है।

भारत एक _______-प्रधान देश है। इस वाक्य में आप क्या क्या नही भर सकते हैं !!! भारत एक कृषि-प्रधान देश है के जुमले से आगे बढ़ कर ??? मसलन ये एक भाव-प्रधान देश है, ये एक त्यौहार-प्रधान देश है। और भारत एक देव-प्रधान देश भी तो है !!

मुझ जैसे व्यक्ति के लिए जो मूलतः Agonist है उसे भारत-भूमि के लोक-मानस में गहरे बैठा ये देवताओं का बैकुंठ हद से ज्यादा रोमांचित करता है। मेरे लिए देवता ‘इष्ट’ से ज्यादा एक ‘रूपक’, एक ‘व्यंजना’ और अमूर्त भावनाओं की एक मूर्त ‘सर्जना’ है। और तो और भारत के लोक-मानस में गहरे पैठा ये देवलोक उसके अंतर्मन को समझने का सबसे निरापद साधन भी है। इसलिए जिसे भारत को समझना हो वो यहां के देव-लोक को समझ ले। यहां उसे Idea of India का प्रगाढ़ सार मिल जाएगा।

भारत के धार्मिक theology की जो सबसे distinguished विशेषता है वो ये है कि यहाँ धर्म ‘शास्त्र’ से ज्यादा ‘लोक’ का विषय है। West के अब्राहमिक धर्मों के विपरीत ये ‘विधान’ से ज्यादा ‘लोकाचार’ से परिचालित होता है। एक धर्म के तौर पर हिन्दू धर्म के असाधारण और अन्यथा दुर्लभ लोकतांत्रिक चरित्र का ये मूल कारक है। राजनीति-विज्ञान का कोई विद्यार्थी इसकी तुलना किंचित ही अ-लिखित संविधान वाले गणतंत्र से करता।

और धर्म ‘शास्त्र’ से ज्यादा ‘लोक’ का विषय है – गणपति से अधिक इस बात के प्रतीक और कौन हो सकते हैं ??!! शिव के लिए आपको पूरा शिव-पुराण मिलेगा, कार्तिकेय (गणेश के सहोदर) का भी आधोपान्त विवरण आपको स्कंद-पुराण में मिल जाएगा। पर गणेश ?? उनके लिए कोई पृथक पुराण नही। कुल मिला कर ऋग्वेद में एक-दो जगह नामोल्लेख और “ब्रह्मवैवर्त” के गणपति खंड में 46 अध्याय जो मूलतः वैष्णव पुराण है, और पुराणों में सबसे ज्यादा समय समय पर संसोधित बताया जाता है। और इसलिए तो मंगलमूर्ति- गणपति हैं, गणेश हैं। क्योंकि वो तंत्र (शास्त्र) से ज्यादा गण (लोक) से संपूरित हैं। और इसलिए सर्वप्रथम पूजनीय हैं, स्मरणीय हैं और निमंत्रणीय हैं !! और इसलिए देवताओं के protocol में सबसे पहले प्रतिष्ठित भी, सबसे पहले आह्वाहित भी। तंत्र पर लोक की ये प्राथमिकता, प्रधानता और प्राबल्यता भारत के लोकमानस के लोकतांत्रिक चरित्र की सबसे वैध पुष्टि भी है।

भारत के लोगो का अपने देवताओं से ‘विग्रह’ इसके मानस के मनोस्थिति और मनोविज्ञान की और भी दुर्लभ अन्तर्दृष्टियाँ प्रदान करता है। जैसे स्त्री-मनोविज्ञान ही ले लें। हिन्दू स्त्रियों के सबसे अभीष्ट देवों को देखिए। आपको स्त्री-मनोविज्ञान के अहर्निश रहस्य उद्घाटित मिलेंगे। जैसे अगर सामान्यीकरण का जोखिम मोल लिया जाए तो हर हिन्दू स्त्री मन ही मन गणेश सा सखा, कृष्ण सा प्रेमी और शिव सा पति चाहती है।

गणेश मंगलकर्ता है, विघ्नहर्ता हैं। और इसलिए सखा के तौर पर सर्वथा उपयुक्त हैं। कृष्ण तो निर्विवाद रूप से प्रेम के साक्षात विग्रह हैं। उनका युद्ध भी प्रीतिकर है, फटकार भी ‘गीता’ है, शरारतें तो ‘लीला’ हैं ही। क्या ही कौतुक की स्त्री विधाता से कृष्ण सा प्रेमी और पुत्र मांगे !! किंतु स्त्री-मनिविज्ञान का सबसे वलित पक्ष तब सामने आता है जब स्त्री पति की कामना करती है। ये अन्यथा नही है कि लड़कियां मनचाहे वर की चाह करते हुए श्रावण सोमवार का व्रत करती हैं। पौरुष से भरे शिव जो सर्वनाश का सौंदर्यशास्त्र रचते हों, जिनके प्रेम में भी एक ‘हिंसा’ हो, जो विपन्न होने के बाद भी अपने सामर्थ्य के बल पर ‘महादेव’ हों और जिसकी अर्धांगिनी बनने से स्त्री स्वतः शक्तिरूपेण हो उठती हो- स्त्री मन ही मन ऐसे ही वर की तलाश करती है। Chocolaty boys are fit for being lovers and sturdy men are fit for being life-partners- पश्चिम की ये नवीन प्रतिपादित कामशास्त्रीय अभिव्यंजना भारत ने बहुत पहले से आत्मसात कर रखी है। वहीं ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ राम का स्त्रियों में ‘अभीष्ट’ के रूप में लोकप्रिय न रहना भी स्त्री-मनोविज्ञान के गहरे अर्थ और संकेत बताता है| So Boys don’t sulk to the fact that ‘good’ boys are often sidelined by girls. They treat even gods same way.

– अनिकुल के कलम से

नोट: ये टिप्पणी मित्र सुशोभित के गणपति पर फेसबुक पर पोस्ट किए गए आलेख से प्रेरित है। ये टिप्पणी उस पोस्ट पर एक टीका-मात्र है, एक उप-संहार है। अन्यान्य विचार उस पोस्ट से लिये गए हैं जिसमे मेरे विचार भी सम्मिलित हुए।

(ये पोस्ट मूल रूप से लेखक के पिछले ब्लॉग पर २९/०८/२०१७ को प्रकाशित हुई थी )

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक पाती

आम आदमी कि भी कुछ कमजोरियां है जो उसके फैसलों में भी रहेगी जब तक कि वो इस नयी जिम्मेदारी के लायक खुद को मजबूत नहीं बना लेता। इसलिए आम आदमी को और आम आदमी के नेता के रूप में खुद को पुख्ता होने का समय दीजिये।

प्रिय अरविन्द केजरीवाल जी,
नमस्कार !!

पिछले कुछ १०-२० दिनों से आपको पत्र लिखने के लिए सोच रहा था. पर एक आम आदमी कि परेशानियां तो आप जानते ही हैं. घर-ऑफिस कि जिम्मेदारियों के बीच समय निकालते निकालते इतने दिन निकल गए. इस देरी का हालांकि फायदा ये हुआ है कि इस बीच आप दिल्ली के मुख्य-मंत्री हो गए हैं तो आपसे कहने, बतियाने के लिए मेरे पास भी एक-दो बातें ज्यादा हो गयी हैं.

पिछले कुछ समय से, अन्ना जी के आंदोलन के समय से ही मेरे आस पास का माहौल बदला है, इतने सारे संयोगो-प्रयोगो को होते देखा है कि ऐसे तो मैं आपसे कई बातें कहना चाहता हूँ, बताना चाहता हूँ. पर बातचीत शुरू करने के लिए जो सबसे पहला मुद्दा एक आम आदमी कि समझ से लगता है कि वो आपकी सेहत का है. एक आम आदमी के लिए उसका शरीर ही सबकुछ होता है. और इस बात पर आपने मुझे बहुत निराश किया है. करीबन आज १५ दिन हो गए होंगे आपकी खांसी के. मुझे नहीं पता कि आप किससे अपना इलाज़ करवा रहे हैं. पर इतना जरुर पता है कि आपका इलाज़ अच्छे से नहीं हो पा रहा है. इतने साल दिल्ली में रहने के बाद इतना दावे से कह सकता हूँ कि आम खांसी सही इलाज़ से दिल्ली के ठण्ड के बीच भी मुश्किल से ५ दिन में निपट जाती है. यदि ऐसा नहीं होता तो या तो खांसी आम नहीं है या डॉक्टर सही नहीं है. इसलिए मुझे उम्मीद है कि आप अपने सेहत को गम्भीरता से लेंगे और दोनों ही सम्भावनाओं कि उचित पड़ताल करेंगे। अपनी आम समझ से एक और बात जो मैं आपसे कहना चाहता हु वो ये है कि राजनीति में आम आदमी भले काम कि चीज़ हो पर सेहत के मामलात में डॉक्टर खास (Specialist) ही काम के होते हैं, आम नहीं। तो इसलिए यहाँ अपने सिद्धांतों को थोडा परे रखियेगा। आपकी सेहत हमारे लिए महत्व्पूर्ण है.

आगे बढ़ते हुए मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि शपथ लेने जाते हुए आप नीले स्वेटर में बहुत जँच रहे थे. और जिस सादगी से आपने भव्यता के प्रतीक समझे जाने वाले पलो को अपने जीवन में स्वीकार किया वो एक मिसाल है. अखबारों में जो ख़बरें आयी हैं उसके मुताबिक आपने अपने लिए घर भी बेहद सादगी वाला ढूंढने का निर्देश दिया है. उसी खबर के मुताबिक़ पूरा PWD विभाग पिछले कई घंटो से इसमें लगा है जो उनके लिए काफी मुश्किल भरी कवायद भी साबित हो रही है. यहाँ मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ. आपके सादगी में इस विश्वास को मेरा नमन. पर मैं यकीं के साथ ये कहना चाहता हूँ कि एक आम आदमी का जेब छोटा हो सकता है लेकिन दिल इतना छोटा नहीं कि अपने मुख्य-मंत्री को एक चारदीवारी वाला मकान मिलने पर तंज़ करे. आप इस आशंका को पूरी तरह अपने दिल से निकाल दे. मैं ये बातें आपको इसलिए लिख रहा हूँ क्यूंकि उसी अखबार में एक खबर ये भी छपी थी कि पूर्वी दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ियों के इलाके में छतें गिर गयी हैं और आबादी का एक बड़ा हिस्सा भरी ठण्ड में भी खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर है. PWD विभाग मुख्य-मंत्री के लिए एक सादे घर के इंतज़ाम में मशगूल रहने के कारण यदि इनकी सुध नहीं ले पाया तो ये उतना ही निर्मम होगा जितना मुख्य-मंत्री के लिए एक आलिशान बंगला ढूंढने में लगे रहने में सुध न ले पाने के कारण होता। ये तो एक तात्कालिक कारण है. एक बड़ा कारण ऐसा कहने का ये है कि मैंने उसी दिन एक और खबर पढ़ी थी. ये खबर उन मुख्य-मंत्रियों के बारे में थी जिन्होंने ऐसी ही कम-ज्यादा सादगी दिखायी थी. जैसे बंगाल के मुख्य-मंत्री, त्रिपुरा के मुख्य-मंत्री, ओड़िसा के मुख्य-मंत्री थे. अब अगर बंगाल- ओड़िसा के आम आदमी कि बात की जाये जो दिल्ली कि सड़को पर अक्सर मिल जायेंगे तो उनसे मिलकर तो दिल्ली के आम आदमी को खुद के खास होने का रश्क होने लगे. आप इशारा समझ रहे होंगे। मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है.

आपने राजनीति में कम समय में ही ऐसे कई अभिनव प्रयोग करके दिखा दिए हैं कि बड़े बड़े महारथीयों के भी होश गम हो गए. इसके लिए साधुवाद। जब आपने कोंग्रेस से गठबंधन के लिए वापस जनता के बीच जाने का, उसकी राय इसपर राय जानने का प्रयोग किया तो यकीं मानिये मेरा दिल फूला नहीं समा रहा था. आप का ही एक भाषण सुना था जब आप मेरे इलाके में चुनाव प्रचार के लिए आये थे. आपने कहा था कि आम आदमी डरा हुआ है. ये बात मैंने उस दिन प्रत्यक्ष महसूस की. आपके उस प्रयोग से दिल तो फुला नहीं समां रहा था पर दिमाग में कुछ डर सा भी लगा. पर चूँकि आम आदमी को खुश होने के मौके बहुत कम मिलते हैं इसलिए उस आशंका को दबा मैं सबों के साथ खुश हो गया. जनता कि राय से सरकार चले, उसकी भागीदारी हो- वाह मुझ जैसे आम आदमी को तो मनो जमीं पर ही जन्नत नसीब हो गयी. पर अब हर काम क्षेत्र कि जनता के राय से, मर्ज़ी से ही होगा; क्षेत्र कि जनता के मर्ज़ी से ही कानून बनेंगे, हटेंगे- ये मैंने आपके पार्टी के कई नेताओं के मुह से और आपके मुँह से भी सुना। इसने मेरी पहले दिन कि आशंका को फिर से सर उठाने का मौका दे दिया। फिर आपके एक विधायक को टीवी पर एक सवाल के जवाब में जम्मू-कश्मीर के भारत या पकिस्तान में रहने के सन्दर्भ में इसी फॉर्मूले को लागु करने की जिद करते देखा। ये सुनने के बाद मुझे वही बात याद आ गयी- किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है. ये सुनने के बाद मुझे लगा कि मुझे आपको कुछ बातें जरुर बतानी चाहियें। एक दिल्लीवासी होने के नाते 700 L मुफ्त पानी और बिजली के आधे बिल मेरे लिए जन्नत कि नेमतों से कम नहीं है. पर इन सबके बावजूद इसके लिए जम्मू-कश्मीर कि कीमत थोड़ी ज्यादा लगती है. मैं एक आम आदमी हूँ इसलिए अपनी ताकत के साथ साथ अपनी कमजोरोयों को भी अच्छे से जानता हूँ. मैं आपकी इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखता हूँ कि आम आदमी डरा हुआ है. मैं भी डरा हुआ हूँ, अपनी कमजोरियों से. मैं डरा हुआ हूँ कि जम्मू-कश्मीर कि छोड़िये, ऐसे प्रोत्साहन मिलने पर कल को मैं खुद दिल्ली को एक अलग देश बनाने कि मांग का समर्थन कर दूँ. मैं डरा हुआ हूँ कि यदि क्षेत्र कि जनता की मर्ज़ी के हिसाब से ही कानून बनने लगे/ ख़त्म होने लगे तो देश के सबसे खराब लिंग अनुपात वाले पंजाब में वहाँ कि जनता अपने पूर्वाग्रहों के कारण भ्रूण-हत्या-रोकथाम कानून खत्म न कर दे. मैं डरा हुआ हूँ कि Honor Killing के लिए कुख्यात हरयाणा में जनता उसे जायज़ बनाने का कानून न ले आये. ऐसी और कई चीज़ें हैं जिनसे मैं डर जाता हूँ. और मैं डरता हूँ कि आम आदमी को फायदा पहुचने और उसका उत्थान करने वाले पहले भी आये कई कथित क्रांतिकारी विचारों, इन्कलाबों जैसे समाजवाद, समतावाद, मार्क्सवाद कि तरह ये इंकलाब भी अपने कर्णधारों के अतिरेक उत्साह और अकुशलता के कारण बिना किसी ठोस बदलाव को लाये एक चूका हथियार बन कर न रह जाये।

हो सकता है कि मैं नाहक डर रहा होऊं और ऐसा कुछ न हो. लेकिन ये भी हो सकता है कि मेरा डर सही साबित हो. क्यूंकि इस देश के इतिहास ने कई बार ऐसे डर को सही साबित किया है- विनोबा भावे के आंदोलन से लेकर जेपी के आंदोलन तक और शायद अनना के आंदोलन तक भी. एक और बात कहूंगा। अखबारों से ही सुना कि आप लोकसभा का चुनाव भी लड़ने वाले हैं ताकि केंद्र में भी आम आदमी को उसकी सरकार मिल सके. आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है. लेकिन एक दिल्ली-निवासी और एक आम आदमी होने के नाते मैं आपको ये सलाह देने का दुस्साहस करूँगा कि फिलहाल आप दिल्ली पर ही ध्यान दे. आप आम आदमी के सहारे, उसके फैसलो के सहारे सत्ता चलना चाहते हैं. लेकिन आम आदमी कि भी कुछ कमजोरियां है जो उसके फैसलों में भी रहेगी जब तक कि वो इस नयी जिम्मेदारी के लायक खुद को मजबूत नहीं बना लेता। इसलिए आम आदमी को और आम आदमी के नेता के रूप में खुद को पुख्ता होने का समय दीजिये। सदियों कि जड़ता है, इसे ख़त्म होने में सदियाँ तो नहीं लेकिन दशक का वक़्त तो लगेगा ही. इसे वो वक़्त दीजिय। ज्यादा आंच खाने को जल्दी बनाने से ज्यादा उसे खराब कर देती है. पिछले एक साल में हिंदुस्तान के आम आदमी ने सीरिया, मिस्र, अरब के आम आदमी से इतना तो सिखा ही है. मैंने पहले भी लिखा है कि किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को खत्म कर देता है, चाहे वो उत्साह का अतिरेक हो, फैलाव का या बदलाव का अतिरेक।

ये पत्र जब तक आपको मिले हो सकता है कि नया साल आ जाये। नया सबेरा, नया सूरज, नयी रोशनी। उम्मीद करता हूँ कि ये सूरज अँधेरे में रहने वाले लोगो के लिए नया दिन लेकर आएगा और बदन झुलसा देने वाले दोपहर के अतिरेक से बचा रहेगा।

वंदे मातरम !!
एक आम आदमी
अभिनव

 

P.S.:- This letter from writer to Shri Arvind Kejriwal was written on 30/12/2013 as a facebook post (https://www.facebook.com/abhinav.shankar.50/posts/604996452906849). Being republished in this site for purpose of record only.