The evolution of Polity

तमाम बदनामियों के बावजूद राजनीति (अर्थशास्त्र के बाद) मानव समाज का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावकारी विषय है, लगातार बना हुआ है। ब्रिटानिया के brexit और अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प के विजय से लेकर इजराइल में नेतन्याहू का लगातार मजबूत होते जाना- इन घटनाओं ने विश्व को जितना प्रभावित किया है शायद ही किन्ही और घटनाओं ने किया हो। राजनीति आज भी समाज को सबसे ज्यादा करीब से प्रभावित करती है। राजनीति को अगर सबसे कम शब्दों में बताया जाये तो ये समाज के अन्यथा बेतरीब क्रियाकलापों को एक सार्थक और स्पष्ट दिशा देने की जुगत है। और राजनीति के सबसे समाचीन और शायद सबसे उन्नत उपकरण के रूप में लोकतंत्र मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। एक fan के तौर पर नही। बल्कि एक case study के तौर पर। लोकतंत्र अपने आप में एक रोचक चीज़ है। इसका इतिहास भी, और इसका क्रमतर विकास भी।

शायद ही इसमें कोई दोमत होगा की फिलहाल लोकतंत्र राजनीति का सबसे उन्नत और परिपक्व उपकरण है। और सबसे delicate भी। लोकतंत्र एक बृहद मनुष्य समाज के तौर पर हमारे collective conscious के क्रमतः परिपक्व होने की कहानी है। जैसा की राजनीति चूँकि वस्तुतः समाज के बेतरीब क्रियाकलापों को एक दिशा देने की क्रिया थी हमने एक समाज के तौर पर अपने सामूहिक विवेक के विकास के शैशव काल में एक व्यक्ति के हाथ में इस दिशा को निर्धारित करने का काम delegate कर दिया। कालान्तर में ये monarchy जैसी संस्था में तब्दील हो गयी। जो अपने साथ ‘सत्ता’ का जबरदस्त केंद्रीकरण लेकर आई। “सत्ता”- यानि राजनीति का एक organic विस्तार। राजनीति जब फलीभूत होती है तो सत्ता के तौर पर सामने आती है।

अब जैसे जैसे हमारी कलेक्टिव कॉन्शियस का विकास हुआ हमने महसूस किया कि सत्ता का ये केंद्रीकरण समाज के स्वस्थ growth को एक तरह से रोक रहा है। तब राजा का साथ देने वाले मात्यों के सलाह को राजा के लिए बाध्यकारी कर दिया गया। फिर मात्यों को जनप्रतिनिधियों से replace कर दिया गया। फिर एग्जीक्यूटिव हेड और नॉमिनल हेड ऑफ़ गवर्नमेंट की अवधारणाएं आयी और हम नॉन-रिपब्लिकन डेमोक्रेसी की तरफ बढ़ें। फिर नॉमिनल हेड को भी जनता से चुना हुआ बनाया गया और हम रिपब्लिकन डेमोक्रेसी की तरफ फाइनली बढे। हमने महसूस किया कि सत्ता का जितना विकेंद्रीकरण किया जा सकें उतना अच्छा है। और हम क्रमशः उस दिशा में बढ़ते चले गए। अब तो referendum democracies की बात की जा रही है जहाँ हर छोटे बड़े इश्यूज पर लोगो की वोटिंग से ही फैसला किया जाये। यानी की सत्ता का पूर्ण विकेंद्रीकरण।
पहली नज़र में बड़ी अच्छी लगने वाली ये बात अपने साथ एक बारीक पेंच लेकर आती है। सोचिये की आखिर सत्ता ने समाज में अपनी जरुरत ही कैसे बनायी होगी ? जाहिर तौर पर राजनीति के जरुरत के तौर पर क्योंकि आखिर ये राजनीति का ही ‘आर्गेनिक’ विस्तार है। और राजनीति की जरुरत क्यों महसूस की गयी होगी ? क्योंकि अन्यथा समाज के असंगठित क्रियाकलापों को एक दिशा की जरुरत थी जो समाज के विकास के लिए जरुरी थी। सत्ता का पूर्णतः विकेंद्रीकरण हमें वापस उसी दशा में ले जाता है जहाँ ‘दिशा’ के लोपन का खतरा होता है। इसलिए सत्ता का एक निश्चित केंद्रीकरण भी समाज के सुचारू चलन और विकास के लिए उतना ही जरुरी है।

अनिकुल के कलम से

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